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आईटी की विवशता है हिंदी के अनुरूप ढलना – बालेन्दु दाधीच

कंप्यूटर और इंटेरनेट पर हिंदी की स्थिति पर इनसे बेहतर भला कौन लिख सकता है? प्रभासाक्षी के समूह संपादक बालेदु दाघीच जी का एक लेख आज के नवभारत टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ का मुख्य आलेख है। बालेन्दु जी जहां हिंदी के भविष्य में इंटेरनेट और कंप्यूटर पर प्रयोग को ले कर आश्वस्त हैं वहीं वे ट्रांसलिट्रेशन जैसी तकनीकों से पूरी तरह संतुष्ट न हो कर हिंदी कंप्यूटरिकरण के व्यापक आवश्यकता पर न सिर्फ जोर देते हैं बल्कि इसे अवश्यंभावी भी बताते हैं। आज हिंदी दिवस पर छपे उनके इस सारगर्भित लेख के कुछ अंश:

इनफॉर्मेशन टेक्नॉलजी की शुरुआत भले ही अमेरिका में हुई हो, भारत की मदद के बिना वह आगे नहीं बढ़ सकती थी। गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक श्मिट ने कुछ महीने पहले यह कहकर जबर्दस्त हलचल मचा दी थी कि आने वाले पांच से दस साल के भीतर भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार बन जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ बरसों में इंटरनेट पर जिन तीन भाषाओं का दबदबा होगा, वे हैं- हिंदी, मैंडरिन और इंगलिश।
श्मिट के बयान से हमारे उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए जो यह मानते हैं कि कंप्यूटिंग का बुनियादी आधार इंगलिश है। यह धारणा सिरे से गलत है। कंप्यूटिंग की भाषा अंकों की भाषा है और उसमें भी कंप्यूटर सिर्फ 2 अंकों- एक और जीरो, को समझता है। बहरहाल, कोई भी तकनीक, कोई भी मशीन उपभोक्ता के लिए है, उपभोक्ता तकनीक के लिए नहीं। कोई भी तकनीक तभी कामयाब हो सकती है जब वह उपभोक्ता के अनुरूप अपने आप को ढाले। भारत के संदर्भ में कहें तो आईटी के इस्तेमाल को हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में ढ़लना ही होगा। यह अपरिहार्य है। वजह बहुत साफ है और वह यह कि हमारे पास संख्या बल है। हमारे पास पढ़े-लिखे, समझदार और स्थानीय भाषा को अहमियत देने वाले लोगों की तादाद करोड़ों में है। अगर इन करोड़ों तक पहुंचना है, तो आपको भारतीयता, भारतीय भाषा और भारतीय परिवेश के हिसाब से ढलना ही होगा। इसे ही तकनीकी भाषा में लोकलाइजेशन कहते हैं। हमारे यहां भी कहावत है- जैसा देश, वैसा भेष। आईटी के मामले में भी यह बात सौ फीसदी लागू होती है।

आईबीएम, सन माइक्रोसिस्टम और ओरेकल ने हिंदी को अपनाना शुरू कर दिया है। लिनक्स और मैकिन्टोश पर भी हिंदी आ गई है। इंटरनेट एक्सप्लोरर, नेटस्केप, मोजिला और ओपेरा जैसे इंटरनेट ब्राउजर हिंदी को समर्थन देने लगे हैं। ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी हिंदी की धूम है। आम कंप्यूटर उपभोक्ता के कामकाज से लेकर डाटाबेस तक में हिंदी उपलब्ध हो गई है। यह अलग बात है कि अब भी हमें बहुत दूर जाना है, लेकिन एक बड़ी शुरुआत हो चुकी है। और इसे होना ही था। यह दिलचस्प संयोग है कि इधर यूनिकोड नामक एनकोडिंग सिस्टम ने हिंदी को इंगलिश के समान ही सक्षम बना दिया है और लगभग इसी समय भारतीय बाजार में जबर्दस्त विस्तार आया है। कंपनियों के व्यापारिक हितों और हिंदी की ताकत का मेल ऐसे में अपना चमत्कार दिखा रहा है। इसमें कंपनियों का भला है और हिंदी का भी।

पूरा लेख यहां है।

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2 thoughts on “आईटी की विवशता है हिंदी के अनुरूप ढलना – बालेन्दु दाधीच”

  1. वो सब बराबर बात पर हम ने कभी सोचा है की हमारी जादा तर वेब साइट्स लोगों को मालुम नही इअसके बारे में आप का क्या ख्याल है?

  2. बालेन्दु जी के लेख बारे जानकारी देने के लिए धन्यवाद। बाकी लेख जाकर पढ़ते हैं आपके दिए लिंक पर।

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