महानगर हिंदी चिट्ठाकार मिलन

भई दो महानगरों के चिट्ठाकार मिलेंगे तो उसे महानगर चिट्ठाकार मिलन ही कहा जायेगा ना? तो मुम्बई से आये शशि सिंह जो “मान ना मान मैं तेरा मेहमान” कह कर आये और दिल्ली वालों के दिलों में घर कर गये। बहुत ही जीवंतता है साहब इनकी चमकती आंखों और भावों से भरे चहरे में, कुछ … आगे पढ़ें

लगे रहो मुन्ना भाई

हैल्लो सरकिट अरे मुन्ना भाई, भोत दिन बाद फोन किया भाई? अरे तेरे कु एक भोत मजेदार बात बताने के वास्ते फोन किया। चिंकी के बाप से फिर कोई लफ्ड़ा हुआ क्या? अरे नईं अपुन ने अपना एक चिट्ठा बनाया । कट्टा बनाया? भाई तुम फिर भाईगिरी सुरु कर दिया क्या? अरे कट्टा नईं रे। … आगे पढ़ें

एनडीटीवी पर हम

जी नहीं जनाब हम अपने उस इंटरव्यू की बात नहीं कर रहा हूं जो १०-१२ दिन पहले एनडीटीवी ने सुबह सुबह के समाचारों में दिखाया रहा। हम बात कर रहा हूं एनडीटीवी पर हमार बिलाग की। अरे बूझे कि नाहि? भई बात ये बा कि ए हमार एनडीटीवी ने अपने वेबसाईट ndtv.com पर बिलाग बनावे … आगे पढ़ें

गरीब के सपने और सरकार की तोता रटंत

दिल्ली में ऑटो पर बैठना हो तो यह मान कर चलना पड़ेगा कि अधिकतर ये लोग फालतू पैसे मांगते हैं और कई बार बद्तमीजी भी करते हैं। मगर उस दिन जो अनुभव मेरे साथ हुआ आपको भी बताता हूं। दोपहर के समय प्रगती मैदान से निकला तो ऑटो ढूंढ रहा था बाराखंबा रोड जाने के … आगे पढ़ें

कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२

अमित जी ने मेरी पिछली पोस्ट “कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू” के जवाब में एक किस्सा दिया है कि किस प्रकार महिलाओं को बस में सीट देने के बाद आभार तक व्यक्त नहीं करतीं। अमित जी लिखते हैं पर बीते ज़माने की किसी महिला को यदि सीट दी जाती, तो आभार प्रकट … आगे पढ़ें

कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”

रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका ने मुंबई को अशिष्ट नागरिको का शहर बताया है। अपने चिट्ठाकारों ने इतना कुछ लिख दिया इस विषय पर कि पिछली अनुगूंज पर भी इतना नहीं लिखा। मेरा मानना यह है कि इस प्रकार के सर्वे वैज्ञानिक तरीके से नहीं कराए जाते इसलिए यह विश्वसनीय नहीं होते। जब चुनाव के वक्त हमारे … आगे पढ़ें

बालमन पर इमरजेंसी का डर

आज नीरज भाई ने लिखा तो मुझे भी आपतकाल का एक किस्सा याद आ गया। मैं दस साल का था, छठी कक्षा में पढ़ता था। इतनी राजनैतिक या सामाजिक समझ तो नहीं आई थी मगर यह पता था कि सरकार ने कुछ नियंत्रण लागू किये हैं आम लोगों पर। इमरजेंसी की इतनी समझ थी कि … आगे पढ़ें

संवेदनशील बच्चे

बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। उनकी आवश्यकताएं भौतिक तो होती ही हैं, भावनात्मक ज्यादा होती हैं। भावनात्मक इस लिये क्योंकि आजकी भागती दौड़ती दुनिया में हर पिता का ज्यादा जोर अपने बच्चों की भौतिक आवशकताओं को पूरा करने में रहता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम केवल अच्छे कपड़े, घर पर बच्चों के लिये … आगे पढ़ें

अपने प्यारे पापा को कविता

अपने प्यारे पापा को कविता.  कल फ़ादर डे पर यूं ही एक कविता लिखने की कोशिश की है.  वैसे तो मैं कवि नहीं हूँ और कविता लिखने की कुछ समझ भी नहीं है फिर भी कभी कभार कोशिश कर लेता हूँ. आशा है आपको पसंद आएगी और आप इसे जरूर सराहेंगे. यह कविता समर्पित है … आगे पढ़ें

अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो कभी महीने में एक आध बार ही नजर आता है, सुबह सुबह मुँह अंधेरे एक बड़ा सा झाड़ू लिया और … आगे पढ़ें