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लगे रहो मुन्ना भाई

हैल्लो सरकिट
अरे मुन्ना भाई, भोत दिन बाद फोन किया भाई?
अरे तेरे कु एक भोत मजेदार बात बताने के वास्ते फोन किया।
चिंकी के बाप से फिर कोई लफ्ड़ा हुआ क्या?
अरे नईं अपुन ने अपना एक चिट्ठा बनाया ।


कट्टा बनाया? भाई तुम फिर भाईगिरी सुरु कर दिया क्या?
अरे कट्टा नईं रे। चिट्ठा। चिट्ठा बोले तो बिलाग।
अरे मुन्नाभाई अपुन की खोपड़ी में कुछ नईं आ रेला जरा खोल के बता ना।
अरे सरकिट अपुन जैसे आठवीं किलास में कापी में शेर लिखते थे ना छोकरी लोग को सुनाने के वास्ते, इदर वेसैईच भाईलोग डायरी लिखते हैं, ईटरनेट पर।
भाईलोग डायरी लिखते हैं?

अरे वो भाईलोग नईं। पर इदर भी सब लोग एक दूसरे को भाई कह कर बुलाते हैं, जीतू भाई, फुरसतिया भाई, समीर भाई, संजय भाई……. अरे अपुन को अईसा भाई लिखने की आदत पड़ गया एक दिन तो गलती से रत्ना भाई लिख दिया। सच्ची, जब से इदर आया है ना अपुन का तो मन लग गया है। और एक बात बताउं, यहा पर नारद भी है।
नारद? वो स्वर्ग से उतर कर मुंबई में क्या कर रहा है?

अरे नईं, नारद भी एक तरह की साईट है उसमें सब हिंदी चिट्ठों की आर एस एस फ़ीड आती है।
कोई संघ परिवार वाला है क्या?

अरे नईं सरकिट, तुझे याद है जब हम एग्जाम दिया था, वो डाक्टर का बच्चा उदर से बोलता था और अपुन इदर लिखता था, तू समझ ले नारद भी वैईसेच है। इदर तुम अपने चिट्ठे पर लिखो, उदर सब नारद पर दिख जायेगा।
बड़े कमाल का सिसटम है भाई।

एक ही पिराब्लिम है भाई। अगर किसी ब्लागर भाई को जादू कि झप्पी डालनी हो तो मुमकिन नईं। कई बार इतना अच्छा लिखते हैं भाई लोग कि जी करता है कि जाके एक जादू की झप्पी डाल आउं। मगर क्या करें टिप्पणी मार के ई गुजारा करना पड़ता है……………..।

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14 thoughts on “लगे रहो मुन्ना भाई”

  1. अति उत्तम.. फ़िल्म की तरह आपका यह लेख भी पठनीय है. ऐसे ही लगे रहो जगदीश भाई.. भाई बोले तो ब्लॉगिया कहीं का.

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