क्या चीँटे की जान

आज सुबह सुबह शेव करते हुए अचानक वाश बेसिन में देखा, एक काला मोटा चीँटा घूम रहा था। इस डर से कि अभी बच्चे ब्रश करने आएंगे तो कहीं चींटा उन्हे काट न ले, मैने शेव के मग्गे का पूरा पानी चीँटे पर उढ़ेल दिया। मैंने सोचा चीँटा बह जाएगा। मगर थोड़ी देर में देखा, चीँटा फ़िर वाश बेसिन के छेद से निकल कर वाश बेसिन मे घूमने लगा।

चींटा

मैने दोबारा और फ़िर तिबारा पानी का भरा मग्गा उस पर उढ़ेल दिया, मगर हर बार वह विजयी हो कर छेद से वापिस निकल आता।

आज पूरा दिन वह मोटा, काला चीँटा बार बार धीरे धीरे वाश बेसिन पर चढ़ता, मेरी आँखों के आगे घूमता रहा।

क्या तो चीँटे का शरीर और क्या चीँटे की जान, मगर वो हारा नहीं। कमजोर नहीं हुआ मुश्किलों के आगे।

एक हम इंसान हैं!

ताकतवर शरीर, तेज बुद्धी, हर प्रकार की सुविधा, मगर जिंदगी कि छोटी छोटी परेशानियों से कैसे घबरा जाते हैं।

अभी कल ही की बात है दिल्ली पब्लिक स्कूल की एक छात्रा ने कम नंबर आने पर आत्महत्या कर ली।

8 thoughts on “क्या चीँटे की जान

  1. बात चींटे की हो रही है तो एक बात मैं भी बताता हूँ:

    अगर आप जमीन पर किसी चींटे को देखें तो एक काम करें. उसे या तो फ़ूँक के द्वारा या फ़िर किसी पेपर इत्यादि की सहायता से उस जगह से दूर कर दें. थोड़ी देर बाद देखें वो ढीठ फ़िर से ठीक उसी जगह पहुँच जायेगा जहाँ से आपने उसे हड़काया था.

    मुझे ऐसा लगता है कि इसके पीछे उनका कोई जीव/प्राणी विज्ञान काम करता है.

    और ऐसा सिर्फ़ चींटे ही नहीं, चीटियाँ और अन्य रेंगने वाले जीव भी करते हैं.

  2. जगदीश भाई,
    आपने अपनी बात कहने का जो अन्दाज चुना वो काबिले तारीफ़ है।अन्त मे आपने अखबार की हैडलाइन देकर हमे सोचने पर मजबूर कर दिया।

    बहुत सुन्दर।

  3. बहुत ही सुंदर लेख है, वाकई हम ईन्सानों के लिऐ सोचने की बात है।

  4. बहुत ही अच्छा उदाहरण चुना है आपने अपनी बात कहने के लिये!!

  5. पता है परसों दिल्ली की एक छात्रा ने रिजल्ट आने से पहले ही आत्महत्या कर ली उसे डर था कि उसके मार्क्स कम आएंगे. ९५ फ़ीसद पाने वाली यह छात्रा अपना रिजल्ट सुनने से पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थी. कितना दबाव है इन विद्यार्थियों पर.. हम तो बेफ़िक्री से इम्तहानात देते आए हैं. प्रख्यात पत्रकार विनोद दुआ जी बता रहे थे कि वे तो स्कूल में एक बार और कॉलेज में दो बार फ़ेल हो गए थे.

  6. सच मैं बहुत अच्छा उदाहरण है. किंतु मुझे नहीं लगता कि इन आत्महत्याओ के लिये हम केवल अपनी शिक्षा प्रनाली को या माता पिता को ही दोष दे सकते हैं. इन बच्चो के दिमाग में क्या चलत है यह भी जानना आवश्यक है. प्रेशर केवल इस पीढी पर नहीं है, और ना ही यह पीढी आत्महत्या के मामले में विरली है.

  7. विजय जी,

    मुझे लगता है कि इस प्राणी विज्ञान की जरूरत इंसानों को भी है।

    जीत्तू जी,
    तारीफ़ के लिये धन्यवाद, सब कुछ आप लोगों से ही सीख रहा हूँ।

    शोहेब भाई, शुक्रिया।

    नितिन जी
    तारीफ़ के लिये धन्यवाद।

    नीरज जी,

    यह हर साल की कहानी है फ़िर भी न तो अभिभावक सचेत होते हैं और न ही स्कूल वाले।

    How do we know आपको मैं बुल्ले शाह बुलाऊंगा।
    हम अपने बच्चों के मन में यह दिलासा भी नहीं दिला पाते कि एक एग्जाम से दुनिया समाप्त नहीं हो जाती।

  8. मुजे लगता है के प्र्तीस्पर्धा के इस युग मे ये जरुरी है के बच्चो पर पडाइ का थोडा प्रेशर तो होना ही चाहीये.
    टेलीविसन और कोम्पयुटर के कारन बच्चो का ध्यान पडाइ मे कम ही लगता है. ऐसे मे माता पिता के सामने बहुत कम उपाय होते है.
    पर किसी भी चीज की अती हानीकारक होती है ये हम सब जानते है. मुजे लगता है के इस मुश्किल का हल मुश्किल ही है.

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