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साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान

“तो क्या तुम अपनी मां किसी दूसरे को दे दोगे?” मेरी आंखें गुस्से से लाल हो गईं और चेहरा तमतमाने लगा। उन्नीस साल का था मैं। नयी नयी नौकरी और दूसरा तीसरा दिन। कायदे से तो मुझे चुपचाप रहना चाहिये था मगर अगले ने बात ही कुछ ऎसी की कि मुझे बहुत गुस्सा आ गया। लंच टाईम में बात हो रही थी कारगिल जैसी जगहों पर रखवाली करना कितना मुश्किल है तो एक बंदा बोला ” न तो ऎसी जगहों पर घास का तिनका तक उगता और न ही वहां कोई रह सकता है, ऎसी जगह की रखवाली करने की क्या जरूरत है? ऎसा जमीन का टूकड़ा अगर किसी के पास चला भी गया तो…..” इतना भर बोल पाया था वो। उस दिन महसूस किया देशप्रेम क्या होता है।

 

जैसे धूप और हवा हमें आसानी से मिल जाती है तो हम यह भूल जाते हैं कि इनका महत्व क्या है उसी प्रकार हम जब आजाद देश में पैदा हुए और आजाद देश में सांस ली तो यह अहसास नहीं हुआ कि इसकी कीमत क्या है। जैसा विनोद दुआ ने कहा साठ साल एक आदमी की जिंदगी में बहुत लंबे होते हैं और एक देश की जिंदगी में महज एक कदम। मात्र पंद्रह वर्षों पहले देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था और आज हम दुनिया में चॊटी की अर्थव्यवस्थाओं में पंहुच गये हैं, दुनिया हमें असीम संभावनाओं वाला युवा देश मानती है। और यह संभव हुआ लगातार ऊंची विकास दर के चलते। ठीक है गिलास अभी आधा ही भरा है, निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं।

 

आज का दिन है इस हवा को महसूस करने का, छत पर जा कर पतंग उड़ाने का। मालूम नहीं यह पतंग बाजी आजके दिन के साथ कैसे जुड़ गई मगर आजाद हवा को महसुस करने का इससे अच्छा तरीका क्या होता होगा?

 

आज जब अपने मन्नू भाई लालकिले से बोल रहे थे और सुरक्षा कर्मी चप्पे चप्पे को छान रहे थे, BPO में काम करने वाले अपने दिल्ली वाले लंबे सप्ताहंत को मनाने मसूरी जैसी जगहों पर भीड़ कर रहे थे।

 

एक बात और, पता चला है कि आज दिल्ली में शराब की बिक्री बहुत ज्यादा हुई है।

 

खुशी मनाने के लिये……. और गम भुलाने के लिये भी…….. ।

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