गंजहों की गोष्ठी – चुटीले अंदाज में तीर

“लोकतंत्र पर आए ख़तरे से लड़ने के लिए ही भारत में पहली बार आपातकाल लगाया गया।”

– गंजहों की गोष्ठी

पुस्तक को कहीं से भी पढ़ना शुरू कर दीजिए इस तरह के छोटे-छोटे वाक्य आपको पूरी पुस्तक में मिल जाएंगे जिन्हें आप मन ही मन दोहराते रहेंगे और उन का आनंद लेते हुए मुस्कुराते रहेंगे।

सकेत जी को जिन्होंने ट्विटर पर पढ़ा है वह जानते हैं की किस तरह इस तरह के चुटीले वाक्य उनकी विशेषता हैं। आज के समय में जब सोशल मीडिया पर हर कोई राजनैतिक बहस में पड़ा है, राजनीति में हो रहे हर समय के उठापटक और टीवी चैनलों पर 24 घंटे चलती बहस राजनीति को तल्ख बना रही है ऐसे में विचारों की गंगा के उबाल को यदि निर्मल करना हो तो साकेत जी की यह पुस्तक आपके लिए है।

पुस्तक : गंजहों की गोष्ठी

लेखक : साकेत सूर्येश

प्रकाशक : Notion Press

कीमत : ₹१२०


लोग आए थे, जिसमें कुछ बढ़ी दाढ़ी वाले विचारमग्न युवा थे जो सिगरेट के धुएँ का आवरण ओढ़ कर अपने बौद्धिक स्तर को और उन्नति देने में प्रयासरत थे। महिलाएँ सुंदर काटन की साड़ियों में थीं। मनुष्य की बौद्धिकता के विकास में काटन साड़ियों का भी वही स्थान है जो सिगरेट का अविष्कार का और नाई के अवकाश का।

– इसी पुस्तक से

आप किसी भी राजनीतिक विचारधारा के हों, जैसे-जैसे आप पुस्तक पढ़ते जाते हैं आपके मन को चुटीले वाक्य निर्मल करते जाते हैं। गंजहों की गोष्ठी को पढ़ने के बाद ना कोई राजनीतिक द्वेष ना कोई गुस्सा बस निर्मल हंसी ही रह जाती है। कहीं-कहीं साकेत के चुभते तीर आपको भीतर तक छलनी भी कर देंगे और एक टीस सी रह जाएगी जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।

 पुस्तक के हर पार्ट में आपको वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का कोई ना कोई घटनाक्रम मिल जाएगा. साकेत ना सिर्फ आपको गुदगुदाते हैं बल्कि सोचने पर भी मजबूर करते हैं। ‘छगनलाल का ब्याह’ पढ़ते हुए तो आप अवाक रह जाते हैं,  कहीं-कहीं साकेत आपको हैरान भी कर देते हैं।

ब्रह्मऋषि अपने नन्हे कुत्ते से खेलने में व्यस्त हो चुके थे। हिंदुत्व सुरक्षित हाथों में था।

– इसी पुस्तक से

कई बार वे किसी घटनाक्रम का वह पक्ष दिखा देते हैं कि टीवी समाचार की बहसों में पंद्रह खिड़कियों में बैठे तथाकथित पैनलिस्ट आपको हवा हवाई शोर मचाते ही लगेंगे।

यह पुस्तक ऐसे समय में आई है जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। मैं यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा कि हिंदी के लिए व्यंग लेखक और व्यंग पर छपना कम हो गया है बल्कि इसलिए कह रहा हूं की जब पत्रकारिता में लोग सांचों में बंट गए हो और सोशल मीडिया तू तू मैं मैं और गाली गलौज से आगे ना बढ़ रहा हो, ऐसे में इस तरह की पुस्तक आषाढ़ में चुभते बदन पर पड़ी ठंडी बरसात की बूंद की तरह है।

कश्मीरी नेता गिलानी पर और दिल्ली के नेता ग्लानि पर क्षमा नही माँगते।

– गंजहों की गोष्ठी

पुस्तक का आकार थोड़ा छोटा है जिससे ऐसा लगता है कि अभी तो सफर का आनंद लेना शुरू ही किया था कि मंजिल आ भी गई।

हिंदू – विंदू कुछ नही होता, सब मन का वहम है। होता है जाट, गुर्जर, बनिया, बाभन, पटेल, यादव। होता है उत्तर -दक्षिण भारतीय। हिंदू अपने आप में कोई परिभाषित करने वाली वस्तु नहीं है। हिन्दू वोट वैसे ही है जैसा हमने पहले कहा था – २ जी लॉस की तरह – नोशनल।

साकेत शब्दों के खिलाड़ी हैं और भाषा में नए प्रयोग भी करते हैं मगर आज के समय को देखते हुए यदि भाषा को थोड़ा और आसान और हर किसी के समझने लायक बनाते तो पुस्तक की पहुंच वहां तक भी होती जहां हिंदी को कम समझने वाले लोग हैं। हालांकि पता चला है कि पिछले दिनों चल रहे चैन्नई पुस्तक मेले में भी इस पुस्तक को हाथों हाथ लिया गया।

आप चाहे साहित्य में रुचि ना रखते हो, पर आज के सोशल मीडिया के समय में राजनीति में तो हर किसी की रुचि है और यदि आप राजनीति में रुचि रखते हैं तो यकीन मानिए यह पुस्तक आपको भरपूर आनंद देने वाली है।

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